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Adjustment समायोजन Paper 1 & 2

Adjustment समायोजन Paper 1 & 2. व्यक्ति के जीवन में अनेक बार ऐसी परिस्थितियां आती हैं जिसमें व्यक्ति कठिनाई का अनुभव करता हैं तथा अपनी इच्छाओं, आवश्यकताओं व अभिलाषाओं की पूर्ति वह तत्काल नहीं कर पाता हैं और ना ही वह संतुष्ट हो पाता हैं। उदाहरण के तौर पर कई छात्र अपनी कक्षा की वार्षिक परीक्षा में प्रथम आने का लक्ष्य लेकर चलता हैं!

और दूसरे छात्रों की प्रतियोगिता के कारण वह अपनी कम योग्यता के कारण वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल होता है तो वह निराश तो होता ही हैं परन्तु अपने इस मौलिक लक्ष्य को ध्यान में रखकर आगे आने वाली परीक्षा में अपने पूर्व के लक्ष्य को प्राप्त करने की वह चेष्टा करता हैं और वह उसे प्राप्त भी कर लेता हैं।
अतः यह उस बालक का अपनी परिवेश व परिस्थितियों के साथ इस प्रकार का समायोजन हैं।

समायोजन दो शब्दों से मिलकर बना है।- सम+आयोजन। सम् का अर्थ हैं- भली -भांति अच्छी तरह या समान रूप से और आयोजन का अर्थ हैं व्यवस्था। अर्थात अच्छी तरह व्यवस्था करना ।
अतएव समायोजन का अर्थ हुआ -सुव्यवस्था या अच्छे ढंग से परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की प्रक्रिया। जिसमें कि व्यक्ति की आवश्यकताएं पूरी हो जाए मानसिक द्वन्द न उत्पन्न हो पाएं।
गेट्स एवं अन्य विद्वानों ने लिखा है कि ‘‘समायोजन शब्द के दो अर्थ हैं एक अर्थ में निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया हैं जिसके द्वारा व्यक्ति स्वंय और पर्यावरण के बीच अधिक सांमजस्यपूर्ण सम्बन्ध रखने के लिए अपने व्यवहार में परिवर्तित कर देता हैं। दूसरे अर्थ में-समायोजन एक सन्तुलित दशा हैं जिस पर पहुचने पर हम उस व्यक्ति को सुसमायोजित कहते है।
बोरिंग तथा लैगफिल्ड यह मानते है कि समायोजन वह प्रक्रिया हैं जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और इन आवश्यकताओं की पूर्ति को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों में  संतुलन रखता हैं।

अध्यापक का समायोजन 

शिक्षण की दृष्टि से अध्यापक का समायोजित होना बहुत अनिवार्य हैं अतः अध्यापक के समायोजन के सम्बन्ध में शिक्षाविदों द्वारा मनोवैज्ञानिकों ने इस बात को बढ़ावा दिया हैं कि अध्यापक का यदि समायोजन नहीं होगा अर्थात् अध्यापक का व्यवहार समायोजित नहीं होगा तो वह अपने शिक्षण को प्रभावी नहीं कर सकेगा।

अतः जिसका सीधा प्रभाव शिक्षार्थियों की अधिगम प्रक्रिया पर पड़ेगा। अतः शिक्षाविद् अध्यापक के असमायोजित व्यवहार के पीछे कुछ कारणों को उत्तरदायी मानते हैं।

अध्यापक के असमायोजित होने के उत्तरदायी कारक

1. वंशानुगत कारक – कई बार असमायोजन के पीछे अध्यापक के वंश से जुड़े हुए घटक सीघे रूप में इस पर प्रभाव डालते हैं
2. कार्यभार की अधिकता होना – शिक्षक को अपने दैनिक कार्यो के अलावा और भी कई कार्यो में लगाया जाता हैं- जनगणना, पशु गणना, मतदान, जनचेतना इत्यादि। जिसकी वजह से अध्यापक का कार्यभार बढ़ जाता हैं।
3. अध्यापकों में राजनीति का होना – अध्यापकों में असमायोजित व्यवहार के पीछे एक प्रमुख कारण अध्यापकों में बढ़ती हुई राजनीति का हैं आपसी गुटबंदी का हैं, आपसी द्वेषभावों का हैं।
4. गैर जिम्मेदार प्रतिवेदन तथा निरीक्षण – इसमें अध्यापक का असमायोजित व्यवहार कई बार उभर कर सामने आता हैं। जब उसके उच्च अधिकारी द्वारा गैर जिम्मेदारी से निरीक्षण किया जाता हैं उसका प्रतिवेदन भी गैर जिम्मेदारी से प्रस्तुत किया जाता है।
5. अध्यापक में बढ़ता मानसिक द्वंद- वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में अध्यापक का सामाजिक स्तर बहुत नगण्य हैं ओर दूसरी और समाज में अध्यापक के पद को किसी भी तरह से सार्वजनिक रूप से प्रतिष्ठा का न मानना।
6. नाखुश पारिवारिक जीवन – कई बार नाखुश पारिवारिक जीवन भी अध्यापकों के असमायोजित व्यवहार का कारण होता हैं। अतः अध्यापकों के असमायोजित होने के पीछे दाम्पत्य जीवन में कड़वाहट व बिखराव एक महत्वपूर्ण कारक हैं।

अध्यापक के समायोजन को बढ़ावा देने हेतु सुझाव

1. अध्यापकों में संतोष, आत्मबल की भावना को जाग्रत करना चाहिए ।
2. अध्यापको को सम्मान देना चाहिए।
3. समाज में अध्यापक स्तर को ऊँचा उठाना चाहिए।
4. अध्यापकों द्वारा परिस्थितियों तथा सामाजिक एवं अन्य चुनौतियो का सामना करना चाहिए।
5. प्रशासकों व अध्यापकों के मध्य बढ़िया तालमेल को बनाये रखना चाहिए।

समायोजन एक यांत्रिकी के रूप में

समायोजन चंकि एक प्रक्रिया हैं जिसको मनोवैज्ञानिक एक यांत्रिकी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। समायोजन के परिपेक्ष्य में मनोवैज्ञानिकों ने इस एक बचावात्मक यांत्रिकी की उपमा दी हैं जिसके मुख्य पक्ष इस प्रकार हैं –
1. यांत्रिकी के रूप में इसकी प्रत्यक्ष विधि – समायोजन चंूकि व्यक्ति या बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य, मानसिक संघर्ष को प्रभावित करता हैं। उस परिपेक्ष्य में इसको एक यांत्रिकी प्रस्तुत करते हुए इसकी प्रत्यक्ष विधि की चर्चा की गई हैं जिसके मुख्य आयाम इस प्रकार हैं –
i) बाधा को नष्ट करना या दूर करना- जब किसी उद्देश्य की प्राप्ति में कोई बाधा उत्पन्न हो जाती हैं तो व्यक्ति उस बाधा को दूर कर सकता हैं या उसको समाप्त करके अपना रास्ता साफ कर लेता हैं और लक्ष्य की ओर बढ़ता हैं। जैसे -डिमेथियस यूनान के एक राजनीतिज्ञ थें उनमें कुछ शारीरिक दोष होने के कारण वे जनता में भाषण देने के योग्य नहीं थे। ऐसी स्थिति में उन्होनें अपने मुंह में कंकड़ रखकर बोलने का प्रयत्न किया और अपनी शारीरिक बाधाओं पर विजय प्राप्त की। बाधा को व्यक्तिगत या सामूहिक दोनो रूपों मे हल किया जा सकता हैं।
ii) कार्यविधि में परिवर्तन – जब व्यक्ति यह देखता हैं कि बाधा को सरलता से पार नही किया जा सकता हैं तब वह अपनी पहली योजना पर फिर से विचार करता हैं और लक्ष्य प्राप्ति के साधनों में परिवर्तन करता हैं। जैसे जब एक विद्यार्थी एक वर्ष परीक्षा में असफल रहता हैं तो अगले वर्ष वह अपनी पहले की विधि में (काम के घण्टों मंे) परिवर्तन करता हैं।
iii) प्रतिस्थापन – यदि व्यक्ति अपने लक्ष्य तक पहुँचने मे असफल रहता हैं तो वह उस लक्ष्य को छोड़कर दूसरा अपना लेता हैं , जैसे यदि कोई नौजवान मानसिक सीमाओं के कारण डाक्टर नहीं बन पाता तो अध्यापन को अपना लक्ष्य बना लेता हैं। हमारे समाज में ऐसे बहुत व्यक्ति हैं जो स्थापन के द्वारा अपने आपको समाज में समायोजित कर रहे हैं।
iv) पलायन – बाधाओं से परेशान होकर व्यक्ति कार्य को छोड़ देता हैं। बार-बार फेल होने पर छात्र पढ़ना छोड़ देते हैं।
2. अप्रत्यक्ष- इन विधियों के अन्तर्गत मनुष्य मानसिक द्वंद, निराशा, असफलता से बचने के उपाय करते हैं। इन विधियों के अन्तर्गत ये उपाय प्रयोग में लाये जाते हैं-
i) आत्मीकरण- आत्मीकरण द्वारा व्यक्ति अपना सम्बन्ध दूसरे व्यक्तियों से स्थापित करता हैं। व्यक्ति समाज तथा समुदाय एवं संस्थानो के आदर्शो तथा मान्यताओं के अनुकूल स्वंय को ढालने का प्रयत्न करता है । आत्मीकरण के द्वारा व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के विकास में प्रयत्न करता हैं।
ii) औचित्य स्थापन – अपनी असफलताओं का दोष दूसरो पर थोपकर अपनी बात के औचित्य की स्थापना करते हैं। परीक्षा में फेल हुआ छात्र परीक्षको, कठिन प्रश्न पत्र तथा अध्यापकों पर दोष मढ़ता हैं। औचित्य स्थापन दो प्रकार का होता हैं-
  1. कोई व्यक्ति किसी कार्य असफल होने पर उस कार्य में ही दोष निकालने लगता हैं। इसे खट्टे अंगूर भी कहते हैं।
  2. दूसरे प्रकार के औचित्य स्थापन में व्यक्ति अरूचि कार्य में फंसकर जब उससे बाहर नहीं निकल पाता, तब वह उसे ही अच्छा बताने लगता हैं। इसे मीठे नींबू कहते है।
iii) क्षतिपूर्ति – व्यक्ति जीवन के एक क्षेत्र की कमी को जीवन के दूसरे क्षेत्र में पूरा करता हैं। शारीरिक दृष्टि से कमजोर व्यक्ति व्यायाम द्वारा हृष्ट-पुष्ट और बलशाली बन जाता हैं। क्षतिपूर्ति देा प्रकार की होती हैं
(1) प्रत्यक्ष रूप से (2) अप्रत्यक्ष रूप से।
प्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति जिस क्षेत्र मे कमजोर होता हैं उसी में सफलता प्राप्त करता हैं और अप्रत्यक्ष में व्यक्ति दूसरे क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करता हैं।
iv) प्रक्षेपण – मानसिक चिन्ताओं से बचने के लिए व्यक्ति अपने कार्यो की सफलता को दूसरे व्यक्तियों की असफलता पर आरोपित करता हैं। जैसे एक खिलाड़ी जब खेल में हार जाता है तो दूसरे साथियों को हार के लिए दोषी ठहराता हैं। प्रक्षेपण से व्यक्ति चिन्तामुक्त हो जाता हैं।
v) दमन – अनेक कारणों से व्यक्ति अपनी बहुत सी इच्छाओं को व्यक्त नहीं कर पाता हैं। इच्छाओं का दमन किसी ना किसी रूप में प्रत्येक व्यक्ति करता हैं। दमन जानबुझकर नहीं किया जाता हैं वरन् स्वंय होता हैं कभी-कभी हमारे विचार अचेतन रूप में इतने गहरे पहुँच जाते हैं कि उनको फिर से याद करने के लिए मनोवैज्ञानिक विधियों की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं।
vi) प्रत्यावर्तन – जब व्यक्ति मानसिक कठिनाईयों से दुःखी हो जाता हैं तो वह अपने साधारण व्यवहार की ओर लौट जाता है । जैसे कि शोर से परेशान होकर वह जोर-जोर से रोने लगता हैं।
vii) प्रतिक्रिया निर्माण – तीव्र इच्छाओं और वृत्तियों का दमन कभी-कभी इनसे विपरीत प्रतिक्रियाओं के निर्माण में बदल जाता हैं जैसे-जिस व्यक्ति की काम सम्बन्धी इच्छाओं को दमन हो गया हो वह चेतन रूप में कामुकता के विपरीत हो जाता हैं और बड़े-बड़े आदर्शो को लोगो के सामने रखता हैं।
viii) पलायन – पलायन के द्वारा व्यक्ति अपने आपको मानसिक द्वंद की परिस्थिति से बचा लेता हैं। वह उस समस्या को हल करने का प्रयत्न ही नहीं करता हैं। व्यक्ति की जब वह प्रक्रिया अधिक हो जाती हैं तो वह एकान्तप्रिय हो जाता हैं और उसमें प्रत्येक कार्य के प्रति विपरीत दृष्टिकोण बन जाता हैं।
ix) मतरंग-यथार्थ जीवन की असफलताओं से परेशान होकर मनुष्य कल्पना का आश्रय लेता हैं। इस प्रकार वह दिवास्वप्न की स्थिति से स्वंय को मानसिक तनाव से बचाता हैं।

कुसमायोजन के तत्व

कुसमायोजन की प्रक्रिया में जब एक व्यक्ति अपने को जैविक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि पाने मे असमर्थता का अनुभव करता हैं। इससे उसकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं तथा सामाजिक अपेक्षाओं के बीच में असन्तुलन बन जाता हैं परिणामतः मनोवैज्ञानिक सन्तुलन में बाधा आती है जब व्यक्ति साम्यावस्था को प्राप्त नहीं करता है तो वह कुसमायोजित हो जाता हैं कुसमायोजन के तत्व निम्नलिखित हैं:-

1. तनाव – जब व्यक्ति वातावरण या समय की मांग के अनुरूप व्यवहार नहीं कर पाता हो तनाव का शिकार होता हैं। ऐसी स्थिति में अपनी क्षमताओं को कम पाता हैं।

2. दुश्चिन्ता – दुश्चिन्ता मे व्यक्ति व्यग्र हो जाता हैं । फ्रायड के अनुसार ‘‘व्यक्ति की जो इच्छा अधूरी रह जाती हैं वह अचेतन मन में चली जाती हैं। लेकिन यह इच्छा फिर से चेतन स्तर में आना चाहती हैं। दुश्चिन्ता इसी आन्तरिक चेतन व अचेतन के बीच संघर्ष का लक्षण हैं। दुश्चिन्ता की मात्रा परिस्थिति व समय के अनुसार बदलती रहती हैं।

3. दबाव – व्यक्ति को दबाव प्रतियोगिता के कारण होता हैं। कभी-कभी अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए भी व्यक्ति दबाव महसूस करता हैं।
माॅरिस के अनुसार – दबाव एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक प्रतिबद्ध अवस्था हैं जिसमें व्यक्ति यह अनुभव करता हैं कि उसे एक विशिष्ट भावना के अनुसार रहना या पहुंचना या व्यवहार करना हैं अथवा उसे तीव्र गति से हो रहे परिवर्तनों के साथ अनुकूलन करना हैं।
काफर तथा एपली के अनुसार – दबाव प्राणी की वह स्थिति हैं जब वह स्वंय को खतरे में पाता हैं और अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए समस्त उर्जा को लगा देता हैं।

4. भग्नाशा – जब व्यक्ति अपने उद्देश्य की प्राप्ति नहीं करता व कभी-कभी उद्देश्य प्राप्ति की राह में बाधाएं आती हैं। तब मनुष्य अपने आप से विश्वास खो बैठता है और असफल होने के भाव से उसमें भग्नाशा की स्थिति पैदा होती हैं।

रोजेनविंग के अनुसार – ‘‘जब जीव की जीवन सम्बन्धी आवश्यकताओ की सन्तुष्टि में कुछ या अनेक अविजित बाधाएं उत्पन्न होती हैं तब उसमें कुण्ठा उत्पन्न होती है‘‘।

कुण्ठा संवेगात्मक प्रतिबद्धता की वह अतिरंजित अवस्था हैं जिसमें व्यक्ति तनाव, परेशानी, क्रोध, क्लेश, चिन्ता और दबाव के मिलेजुले रूप को अनुभव करता हैं।

5. द्वंद – बोरिंग, लैगफील्ड तथा वेल्ड के अनुसार ‘‘ द्वंद व्यक्ति की वह अवस्था हैं जिसमें विरोधी तथा समान शक्तियां, प्रेरणाएं एक ही समय में कार्यरत होती हैं‘‘। द्वंद दो परस्पर विरोधी कार्य-पद्धतियों की संक्रिया हैं। द्वंद की स्थिति में व्यक्ति को दो माँगो आवश्यकताओं, मूल्यों जैसी प्रवृतियों में से किसी एक का चयन करना होता हैं एक स्थिति का चयन करना बहुत कठिन हेाता हैं।

द्वंद की इस स्थिति को इस उदाहरण के द्वारा समझा जा सकता है। वनिता की दो दिन बाद परीक्षा हैं और आज उसकी अभिन्न मित्र के विवाह में भी सम्मिलित होना हैं। इस स्थिति में उसके मस्तिष्क में द्वन्द की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं।

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